भारत
में प्रत्येक वर्ष 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया
जाता है। इस दिन को क्रान्तिकारियों के नाम से जाना जाता है। इस दिन भारत के तीन
सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजों ने फांसी
दी थी। इस दिन आजादी के इन तीनों दीवाने को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए शहीद
दिवस मनाया जाता है। 23 मार्च, 1931 की
मध्यरात्रि के समय आजादी के मस्तानों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमते हुए
अपने गले में पहन लिया था। इन तीन वीर शहीदों के डर से अंग्रेजों ने फांसी के समय
से 11 घंटे पहले इनको फांसी पर चढ़ा दिया था। आज शहीद दिवस
के मौके पर जानते हैं कि क्या हुआ था उस दिन।
भगत
सिंह ऐसे बने क्रांतिकारी
28 दिसंबर 1907 को एक जट्ट सिक्ख परिवार में भगत सिंह
का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। 13 अप्रेल 1919 में अमृसर में हुए जलियांवाला बाग
हत्याकांड के बाद भगत सिंह की सोच में काफी बदलाव आया था। जिसके बाद उन्होंने अपनी
पढ़ाई को छोड़ दिया था और अंग्रेजों की गुलामी से आजादी पाने के लिए ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना कर डाली। अंग्रेजों ने
राम प्रसाद बिस्मिल के साथ चार क्रान्तिकारियों को फांसी और 16 को कारावास में डाल दिया था जिसके बाद भगत सिंह ने चन्द्रशेखर आजाद की
पार्टी ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन’ में शामिल हो गए और उस पार्टी को नया नाम ‘हिन्दुस्तान
सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ दे दिया। इसके बाद भगत सिंह और
राजगुरु ने एक साथ मिलकर 17 दिसंबर, 1928 को अंग्रेज अधिकारी जे.पी सांडर्स को मौत के घाट उतार दिया था।
सिर पर
बांधा कफन
13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के
बाद भगत सिंह की सोच बिल्कुल बदल गई थी। अंग्रेजों ने किए इस कल्तेआम से भगत सिंह
बहुत आहत हुए थे और वो मीलों दूर पैदल चलकर पीड़ितों से मिलने के लिए जलियांवाला
बाग पहुंचे। इस हत्याकांड के बाद भगत सिंह का बगावती सुर सामने आया जिसे देख
अंग्रेज घबड़ा गए। जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत भगत सिंह को रास्ते से हटाने में जुट
गई। अंग्रेजों को आखिर वो मौका मिल ही गया, सांडर्स हत्याकांड
के बाद अंग्रेजों ने भगत सिंह और उनके साथियों पर मुकदमा चलाने के बाद उनको फांसी
की सजा सुना दी।
एसेम्बली
बम धमाका
भगत
सिंह चाहते थे कि अंग्रेजों को पता चलना चाहिए कि अब हम सब हिन्दुतानी जाग चुके
हैं और अब वह अंग्रेजों का जुर्म बर्दास्त नहीं करेंगे, उसका मुंतोड़ बवाज देंगे। इस बात को अंग्रेजों कर पहुंचाने के लिए भगत
सिंह ने दिल्ली की एसेम्बली में बम फेंकने की प्लानिंग बनाई। भगत सिंह बिना किसी
खून खराबे के अंग्रेजों तक अपनी बात को रखना चाहते थे। भगत सिंह और उसका साथी
बटुकेश्वर ने मिलकर 8 अप्रेल 1929 को
एसेम्बली में बम फेंका था। जिससे किसी को चोट नहीं आई पूरी एसेम्बली में धुंआ-धुंआ
हो गया था। अगर चाहते तो भगत सिंह वहां से भाग सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं
किया, और बम के धमाके के बाद दोनों ने एक साथ “इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” के नारे लगाने के साथ अपने हाथ में लगे पर्चों को हवा में उछालते रहे।
जिसके बाद दोनों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
फांसी
का समय
भगत
सिंह,सुखदेव और राजगुरु को लाहौर की जेल में 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33
मिनट पर फांसी पर लटका दिया था। फांसी से पहले इनसे आखिरी इच्छा पूछी गई थी उस समय
भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवनी को पूरा पढ़ने का समय
दिया जाए, लेकिन बताया जाता है कि आखिरी इच्छा जिस समय पूछी
गई थी उस समय इनकी फांसी का समय आ गया था। उस समय उन्होंने कहा था- “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।” फिर
किताब को छत की ओर उछालते हुए बोले – “ठीक है अब चलो।”
फांसी के लिए जाते वक्त तीनों मस्ती से एकदूसरे का हाथ पकड़कर गा
रहे थे –
मेरा
रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा
रंग दे बसन्ती चोला। माय रंग दे बसन्ती चोला।।
डर गए
थे अंग्रेज
भगत
सिंह और उनके साथियों को लाहौर षड़यंत्र केस में फांसी की सजा सुनाई गई थी। भगत
सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों को कोर्ट के आदेशानुसार 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, लेकिन अंग्रेजों ने इनके डर की वजह से 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट
पर 11 घंटे पहले ही इनको फांसी पर लटका दिया था।
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