दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि:
12
साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के जुर्म में दोषी को मौत की सजा का
प्रावधान करने वाला अध्यादेश लाने से पहले क्या उसने वैज्ञानिक आकलन किया था?
हाईकोर्ट
ने एक पुरानी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सवाल किया। जनहित याचिका में 2013
के आपराधिक विधि (संशोधन) कानून को चुनौती दी गई है। आपराधिक विधि (संशोधन) कानून
में बलात्कार के दोषी को न्यूनतम सात साल जेल की सजा और इससे कम सजा देने के अदालत
के विवेकाधिकार के प्रावधान खत्म कर दिए गए थे।
रेप पर मौतः कैबिनेट के अध्यादेश को राष्ट्रपति की
मंजूरी, कानून
लागू
कार्यवाहक चीफ जस्टिस एवं जस्टिस सी हरिशंकर की पीठ
ने सरकार से पूछा, ''क्या
आपने कोई अध्ययन, कोई
वैज्ञानिक आकलन किया कि मौत की सजा बलात्कार की घटनाएं रोकने में कारगर साबित होती
है? क्या
आपने उस नतीजे के बारे में सोचा है जो पीड़िता को भुगतना पड़ सकता है? बलात्कार
और हत्या की सजा एक जैसी हो जाने पर कितने अपराधी पीड़ितों को जिंदा छोड़ेंगे?
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के कठुआ , गुजरात
के सूरत और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में नाबालिगों से हुए बलात्कार की घटनाओं से
देश भर में पैदा हुए आक्रोश के बाद केंद्र ने अध्यादेश को मंजूरी दी। हाईकोर्ट ने
कहा कि सरकार असल कारणों पर गौर भी नहीं कर रही और न ही लोगों को शिक्षित कर
रही है। पीठ ने कहा कि अपराधियों को अक्सर
18
साल से कम उम्र का पाया जाता है और ज्यादातर मामलों में दोषी परिवार या परिचित में
से ही कोई होता है।
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