एडवोकेट एहतेशाम हाशमी ने बताया कि उनके पक्षकार की 9.3.2008
में
शादी हुई थी. कुछ समय बाद उनकी बीवी उनको छोड़कर अलग रहने लगी थी, जो पेशे से
डॉक्टर हैं. उनकी शादी बगैर किसी मांग या दहेज के हिंदू रीति रिवाज से हुई थी. मगर
उनकी पत्नी ने उन पर और उनके परिवार के खिलाफ 29.4.2013 को मारपीट, दहेज मांगना, प्रताड़ित
करना, जान से मारने की धमकी देना व अन्य धाराओं पर थाना तालकातोरा, जिला लखनऊ
उत्तर प्रदेश में दर्ज कराई.
इतना ही नहीं उनकी पत्नी ने शातिरगिरी दिखाते हुए 1.7.2013 को थाना कोतवाली जिला
फतेहपुर उत्तर प्रदेश में फिर से दहेज व मारपीट व अन्य धाराओं पर FIR दर्ज कराई.
यह दोनों FIR लगभग एक सी हैं, एक ही आरोप
है और उसी क्रमांक में आरोपी हैं.
पुलिस में दोनों FIR पर चालान न्यायालय में
प्रस्तुत कर दिया. जिस पर की उनका पक्षकार इलाहाबाद हाईकोर्ट में दस्तक दी और मांग
की एक ही इल्जाम है एक ही घटना है और इस पर दो FIR हुई है. कृपया कर इनमें से
एक को ख़तम कर दें या दोनों की इकट्ठा ट्रायल करा दें.
जिस पर की उच्च न्यायालय इलाहाबाद में उनकी याचिका खारिज कर दी.
न्यायालय के आदेश से संतुष्ट ना होकर पीड़ित ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई,
जिस की पैरवी एडवोकेट एहतेशाम हाशमी ने की और दिनांक 8.5.2018 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सही ना मानते हुए पीड़ित की
याचिका की सुनवाई करते हुए पीड़ित को न्याय दिया.
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